हिन्दुत्व एक विचारधारा है, जो कभी किसी पंथ, समुदाय, संस्कृति, परम्परा, भाषा, देश और काल को लेकर मनुष्य में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करती। सभी को समभाव से देखना, यह हिन्दुत्व का प्रमुख सिद्धांत है। प्रकृति, प्रकृति के प्राणीं, एवं पर्यावरण के प्रति प्रभुत्व का भाव हिन्दुत्व विचारधारा में नहीं है। यह ही कारण है की सृष्टि के अनेक घटक देवी-देवता के रूप देखे और पूजे जाते है।

निश्चित रूप से हिन्दुत्व को किसी पंथ या पूजा पद्धति से जोड़ कर बिलकुल भी देखा नहीं जा सकता।

हिन्दुत्व किसी आस्था पर आधारित नहीं है। वह केवल और केवल वैज्ञानिक सनातन धर्म सिद्धान्त पर आधारित है।

विचारधारा की आवश्यकता क्यों हुई?

भूमण्डल मे जितने प्रकार के जड़-चेतन प्राणी है, उनमें मनुष्य का विशेष स्थान है। कारण, मनुष्य को बुद्धि, हस्तकला, प्रज्ञा और विवेक, यह गुण विशेष रूप से प्राप्त है। इन गुणों के कारण मनुष्य सृष्टि से प्राप्त पदार्थों से कुछ भी रचने में सक्षम है।

परन्तु सभी मनुष्य को यह गुण समान रूप से प्राप्त नहीं है। जिसके कारण सभी मनुष्य सभी प्रकार के कार्य करने में सक्षम नहीं है। अतः जीवन निर्वाह के लिये मनुष्य एक-दूसरे पर निर्भर रहता है। इस निर्भरता के कारण,  मनुष्य समुदाय में रहने के लिये बाध्य है।

समुदाय में रहने के लिये आवयशकता होती है, समाजिक व्यवस्था की। और समाजिक व्यवस्था बनती है, समावेशी विचार से, जो समाज की विचारधारा कहलाती है।

समाजिक व्यवस्था में सभी व्यक्ति एक ही विचारधारा के होने के कारण, वह सरलता से रह पाते है।

पूर्व काल में पृथ्वी के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले समुदाय ने अपनी, बुद्धि, परिस्थिति, के अनुरूप अपनी-अपनी विचारधारा विकसित करी। जिसके कारण विश्व में अनेक प्रकार की विचारघारा का अस्तित्व है।

हिन्दुत्व विचारधारा की उत्पति

पृथ्वी के अन्य भौगोलिक क्षेत्र के समान भारत उपमहाद्वीप के निवासियों ने भी अब से ६०००-७००० वर्ष पूर्व अपनी विचारधारा विकसित करी। उस काल के बुद्धिमान वैज्ञानिकों, जिनको ऋषि कहा जाता है के समुख कुछ मूल प्रश्न इस प्रकार थे।

  1. सृष्टि के अस्तित्व का कारण क्या है?
  2. सृष्टि के घटक और पृथ्वी के जड़-चेतन प्राणी, मनुष्य को किस प्रकार प्रभावित करते है?
  3. मनुष्य के गुण क्या है और उसके प्रभाव में मनुष्य किस प्रकार कार्य करता है?
  4. सृष्टि में मनुष्य की भूमिका क्या है?
  5. सृष्टि और समाज में एवं समाज में व्यक्तियों के मध्य समन्वय किस प्रकार का हो?

इन मूलभूत प्रश्नों के उत्तर प्राप्त हुये सनातन धर्म सिद्धान्त के अध्ययन से और उससे विकसित हिन्दुत्व विचारधारा। क्योंकि हिन्दुत्व विचारधारा का आधार सनातन धर्म सिद्धान्त है, इसलिये इस विचारधारा को सनातन धर्म भी कहा जाता है।

सृष्टि के आधारभूत सिंद्धान्तों से विकसित यह विचारधारा समावेशी है और हर परिस्थिति, देश, काल, में सत्य होने के साथ सभी का कल्याण करने वाली है।

हिन्दुत्व विचारधारा क्या है?

सनातन हिन्दुत्व विचारधारा के कुछ मुख्य बिन्दु इस प्रकार है।

  1. सृष्टि चक्र जो क्रियाशील है, उसमें मनुष्य को अपना योगदान देना। अर्थात सृष्टि, समाज एवं स्वयं की समृद्धि के लिये कार्य करना।
  2. सृष्टि के जितने भी घटक है, पृथ्वी के सभी प्राणी और पदार्थ, वह सभी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से मनुष्य जीवन में अपना प्रभाव डालते है। मनुष्य पर उन सबका प्रभुत्व मानना।
  3. प्रकृति से जो भी सम्पदा प्राप्त है, उसका मनुष्य जीवन निर्वाह के लिये उपयोग करे, भोग और संग्रह नहीं।
  4. भूमण्डल की सम्पदा का संरक्षण करना, मनुष्य का दायित्व है।
  5. मनुष्य को प्रकृति से जो भी सामर्थ प्राप्त है और पुरषार्थ करने से जो भी, सामग्री प्रकृति से प्राप्त होती है, उसको अन्यों के सेवा में लगा देना।
  6. सभी प्राणीओं का मूल तत्व एक ही है। अतः देश, काल, वस्त्र, रंग, पूजा पद्धति, भाषा, भिंन -भिंन होने पर भी सभी प्राणीओं को स्वयं में और स्वयं को अन्य सभी प्राणी में देखना। अर्थात समता का भाव रखना। सबके कल्याण की कामना करना और उसके लिये कार्य करना।

यह सभी विचार, विश्व की अन्य सभी विचारधाराओं से भिन्न है। हिन्दुत्व विचारधारा अत्यंत ही समावेशी है। सबका कल्याण करने वाली है।

हिन्दुत्व के मूल मन्त्र

 

वसुधैव कुटुम्बकम

संसार के सभी मनुष्य हमारे अपने परिवार के है। अर्थात संसार के सभी प्राणी परिवार के रूप में मिल कर रहते है और परिवार (संसार) में जो भी संसाधन, सम्पदा है, उनका मिल कर प्रयोग करते है। स्वयं से पहले अन्य को देते है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें। सभी का जीवन मंगलमय हो, किसी को दुःख का भागी न बनना पड़े। परमात्मतत्व, समता के रूप में सबके अन्तःकरण में स्थित हो। मनुष्य का चित हर प्रकार से शान्त रहे। उसको तीनों प्रकार के दुःख की प्राप्ति न हो।

यह मन्त्र केवल मन का भाव नही है। यह हिन्दुत्व विचारधारा का पालन काने वालों के जीवन का उद्देश्य है। और वह इसकी सिद्धि के लिए जीवनतर कार्य करते हैं।

परन्तु जो सृष्टि के नियमों का उलंघन करने वाले है, उनको दण्ड देना भी इस विचारधारा का भाग है।

इसके लिये भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद् भगवद् गीता के अध्याय ४ श्लोक ७ एवं श्लोक ८ में इस प्रकार कहा है:

 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्। ।।४-७।। 

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं (परमात्मा) मनुष्य रूप में प्रकट होता हूँ।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे। ।।४-८।। 

साधुओं की रक्षा करने के लिये, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिये और धर्म की भलीभाँति स्थापना करने के लिये युग-युग से मेरा (परमात्मा) मनुष्य जन्म हुआ है और होता रहेगा।