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सम्युक्तम सेवा परमो धर्म:
स योगी ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति
समता से युक्त होकर प्रकृति, राष्ट्र, समाज की सेवा करना ही मनुष्य का परम धर्म है। इस प्रकार जो योगी भौतिक विषयों से सम्बन्ध का त्याग करता है, उसको ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
विचारक : विवेक गोयल

आध्यात्मिक

गीता सार

हे मनुष्य! तू प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर। हे मनुष्य! तू अपने सांसारिक सम्बंधों को जान। तेरा सम्बंध प्रकृति के प्रत्येक प्राणी, पदार्थ से आत्म रूप से समभाव हैं। समाजिक सम्बंध अनित्य है। अतः तू प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर। हे मनुष्य तू स्वयं को, प्रकृति और परमात्मा को जान और जान कर  […]

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धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष

यह, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]

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योग क्‍या है ?

परमात्मा प्राप्ति की प्रक्रिया को योग कहते है।   योग में स्थित होना मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। इस उद्देश्य के पूर्ण होने पर मनुष्य को परम् आनन्द की प्राप्ति होती है। शरीर के प्रति ममता एवं अहंकार;इन्द्रियों के विषयों में आसक्ति;आसक्ति से अन्त:करण में विषमताएं (राग, भय और क्रोध);  यह सभी विकार मनुष्य को […]

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