1. हे मनुष्य! तू प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर।
  2. हे मनुष्य! तू अपने सांसारिक सम्बंधों को जान। तेरा सम्बंध प्रकृति के प्रत्येक प्राणी, पदार्थ से आत्म रूप से समभाव हैं। समाजिक सम्बंध अनित्य है। अतः तू प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर।
  3. हे मनुष्य तू स्वयं को, प्रकृति और परमात्मा को जान और जान कर  प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर।
  4. हे मनुष्य तू सृष्टि कि रचना और गतिशील होने के विज्ञान को जान और उस गतिशील सृष्टि मे अपनी भूमिका (स्वधर्म कर्त्तव्य कर्म) को जान और जान कर तू प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर।
  5. हे मनुष्य तू अपने स्वधर्म कर्त्तव्य कर्म का पालन, प्रकृत्ति, समाज के कल्याण के लिये कर। कर्म फल रूप से, प्राप्त प्रकृति पदार्थ को निर्वाह मात्र के लिये ही ग्रहण कर, बाकी को पुनः प्रकृत्ति, समाज को अर्पण कर। यही कर्म योग है।
  6. प्राप्त प्रकृति पदार्थ मे राग-द्वेष, और राग-द्वेष से उत्पन्न कामना ही प्राप्त प्रस्थिति में अनुकूल-प्रतिकूल भाव उत्पन्न करती है, जो कि सुख दुख का कारण है। अतः हे मनुष्य तू राग द्वेष में समभाव रख कर केवल प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर।
  7. राग-द्वेष, सिद्धि-असिद्धि, प्राप्त-अप्राप्त में समभाव ही योग है। अतः हे मनुष्य तू योग कर और योग के लिये प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर।
  8. शरीर, मन और बुद्धि में हो रहे क्रियाओं का जो कारण है, उस विज्ञान को जान कर, तू प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर।
  9. हे मनुष्य कर्ता, और उपकरण कौन है, कारण एवं  कार्य, क्या है, तू इस विज्ञान को जान कर प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर।
  10. कारण कि मनुष्य के सारे कार्य प्रकृति में हो रहे है और प्रकृति पदार्थ से हो रहे है, तो उस कार्य का फल भी
  11. प्रकृति के तीन गुण (स्तव, रज और तमोगुण) प्रकृति और मनुष्य के हर क्रिया का कारण है। इस गुण के आधीन हुआ मनुष्य की सारी क्रियाएं होती है। वह व्यर्थ ही अपने दुआरा हुआ मानता है। इस विज्ञान को समझ और प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर।
  12. हे मनुष्य, तू उस शक्ति, उस परमात्मतत्व को जान जिससे यह सारी सृष्टि गतिशील है। अव्यक्त अथवा साकार रूप से (जिस में भी तेरी भावना है) उस शक्ति को, अपना सब कुछ अर्पण कर। अर्पण अर्थात इस माने हुए शरीर को प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु लगाना।
  13. प्रकृति से तुझे जो कुछ भी प्राप्त है, उसको प्रकृत्ति,  समाज की सेवा हेतु लगाना ही तेरी उस परमात्मा के प्रति भक्ति है। अतः तू भक्ति कर और भक्ति भाव में प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर।
  14. जो भी जानने योग्य है, उसको और विज्ञान के ज्ञान को प्राप्त करके, हे मनुष्य तू,  प्रकृत्ति और समाज के कल्याण हेतु आसक्ति रहित होकर कार्य कर।
  15. फल प्राप्ति की कामना ना कर और कार्य की सिद्धि असिद्धि में समभाव रख। कार्य मैं शरीर रूप से करता हू, ऐसा अहंकार न कर।  इस प्रकार किया गया कार्य ही ज्ञान योग है। अतः तू योग कर और प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर।