“प्रसाद” शब्द की परिभाषा के दो भाग है।

प्रथम: यह कृतज्ञता का भाव है। कृतज्ञता, जो व्यक्ति भगवान् के प्रति व्यक्त करता है जब वह संसार की किसी भी वस्तु को ग्रहण करता है।

द्वितीय: कोई भी वस्तु प्रसाद तभी है, जब व्यक्ति वस्तु को उतनी मात्रा में ही ग्रहण करे, जितनी उसको जीवन व्यापन के लिये पर्याप्त हो।

वस्तु को भोग की भावना से ग्रहण करने पर वह भोग वस्तु कहलाती है, प्रसाद नहीं। प्रसाद देने या बांटने की वस्तु नहीं है, यह ग्रहण की जाती है।

प्रसाद पद सनातन धर्म संस्कृति की शब्दावली से आता है और भौतिक वस्तुओँ के प्रति इस प्रकार का भाव होना एवं रखना केवल सनातन धर्म संस्कृति ही सिखाती है। सनातन धर्म संस्कृति यह सिखाती है कि मनुष्य को संसार की सभी वस्तुओं को प्रसाद भाव से ग्रहण करना चाहिये, भोग भाव से नहीं।

“प्रसाद” शब्द को लेकर कुछ और स्पष्टता एवं कुछ भ्रान्तिया जो वर्तमान हिन्दू समाज में उत्तपन्न हुई है, आइये उनको जानते है।

प्रथम – प्राप्त अर्थ को अर्पण कर प्रसाद रूप में ग्रहण करना

जीवन व्यापन के लिये व्यक्ति स्वधर्म का पालन करता है। स्वधर्म का पालन करते हुये मनुष्य को अर्थ, और अर्थ से संसारिक वस्तु की प्राप्ति होती है।

सनातन धर्म सिद्धान्त यह कहता है कि मनुष्य अपने स्वधर्म पालन से जो भी अर्थ, संसारिक वस्तु प्राप्त करता है, उसको भगवान् को अर्पण करना चाहिये। यहाँ अर्पण शब्द केवल भाव मात्र नहीं हैअपितु यह करने की क्रिया है।

अर्पण रूपी कार्य में व्यक्ति स्वधर्म पालन से प्राप्त अर्थ का वह भाग जो जीवन निर्वाहा के लिये पर्याप्त है, उसको जीवन निर्वाहा के लिये प्रयोग करता है। और अर्थ का अधिकांश भाग समाज की सेवा और कल्याण के लिये लगा देता है।

इस प्रकार अर्थ का वह अलप भाग, जो जीवन निर्वाहा के लिये कृतज्ञता के साथ ग्रहण किया जाता है – प्रसाद कहलाता है। और अर्थ का वह अधिक भाग जो, समाज सेवा में लगाया जाता है, दान किया जाता है – भगवान् को अर्पण कहलाता है।

स्पष्ट रहे कि देने वाले के लिये देने वाली वस्तु प्रसाद नहीं कहलाती, वह दान कहलाती है। है। यहाँ प्रत्यक्ष रूप से दान देना वाला व्यक्ति केवल निमित मात्र है।

और अभाव ग्रस्त व्यक्ति उस दान को “भगवान् का प्रसाद” रूप में ग्रहण करता है।

द्वितीय – मंदिर को अर्पण और मंदिर का प्रसाद

हिन्दू संस्कृति में मंदिर के दो स्वरूप होते है।

पहला: मंदिर एक सेवा संस्था के रूप में काम करता है।

दूसरा: मंदिर, भक्त और उसके भगवान् के मध्य में संवाद का स्थान होता है।

मंदिर एक सेवा संस्था:

हिन्दू परम्परा में मन्दिर एक सेवा स्थान है, जहाँ अभाव ग्रस्त, पीड़ित समाज को जीवन निर्वाह के लिये अनेक प्रकार की सुविधाय उपलब्ध होती है। इसके लिये मंदिर की संस्था समय-समय पर अनेक प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करती है।

इन आयोजनों में समाज के आर्थिक रूप से अभाव ग्रस्त या किसी भी प्रकार से पीड़ित व्यक्तियों के लिये सेवा के कार्य किये जाते है।

भक्त और भगवान् के मध्य संवाद स्थान:

भगवान् का आशीर्वाद, कृपा प्राप्ति और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिये व्यक्ति मन्दिर में भगवान् दर्शन के लिए जाता है। व्यक्ति मन्दिर में भगवान् से अध्यात्मिक एवं व्यक्तिगत संवाद करता है। इस भगवान्-भक्त संवाद में मंदिर का पुजारी सहायक होता है और भगवान् का प्रतिनिधत्व भी करता है।

मंदिर को अर्पण

भक्त जब मंदिर जाता है, तब वह दो प्रकार से भगवान् को अर्पण करता है।

पहला:

भक्त जब भगवान् के साथ अपना संवाद करता है, तब वह फल, फूल, माला, मिठाई आदि वस्तु सूक्ष्म रूप से भेट स्वरूप भगवान् को देता है। समान्य भाषा में यह भेट अर्पण कहलाती है। यह अर्पण केवल भाव स्वरूप है। कृतज्ञता का भाव व्यक्त करने के लिये, यहाँ सांकेतिक रूप से वस्तु अर्पण की जाती है। यह केवल भावनात्मक अर्पण है।

दूसरा:

क्योंकि मनुष्य को स्वधर्म से अर्जित अर्थ को समाज कल्याण के लिये लगाना होता है। और क्योंकि मंदिर एक सेवा संस्था के रूप में कार्य करती है। इसलिए भक्त भगवान् के साथ संवाद करते हुये अर्जित अर्थ, भगवान् को (मंदिर में) अर्पण करता है, दान देता है। इस प्रकार दिये जाने वाला दान वास्तव में अर्पण है।

कारण कि इस दान में कृतज्ञता का भाव भी है और दान करने की क्रिया भी है।

अतः जब भक्त संवाद के समय भेट स्वरूप अर्जित अर्थ भगवान् को (मंदिर में) देता है, तब वह अर्पण (दान) करना कहलाता है। और जब भक्त संवाद के साथ भेट स्वरूप फल, फूल, माला, मिठाई आदि सूक्षम वस्तु भगवान् को (मंदिर में) देता है, तब वह केवल भाव रूप अर्पण है।

मंदिर से मिलने वाला प्रसाद :

मंदिर में प्रसाद दो प्रकार से मिलता है

पहला:

भगवान्-भक्त संवाद के उपरान्त पुजारी भक्त को भगवान् के आशीर्वाद के रूप में कुछ भेट करता है, जिसको भक्त प्रसाद रूप में स्वीकार करता है।

यहाँ प्रसाद शब्द केवल भगवान् का आशीर्वाद मात्र है। आशीर्वाद को वस्तु रूप में भवनात्मक रूप से ग्रहण करने के लिये प्रसाद शब्द का प्रयोग किया जाता है।

दूसरा:

मंदिर परिसर में सेवा संस्था के रूप में जब किसी भी वस्तु का वितरण होता है, तब वह वस्तु भगवान् का आशीर्वाद (प्रसाद) कहलाती है। यहाँ वितरण की जाने वाली वस्तु को केवल अभाव ग्रस्त, पीड़ित लोग ही ग्रहण करने वाले होने चाहिये। सम्पन्न लोग अगर इस प्रकार के प्रसाद को ग्रहण करते है, तब वे पाप के भागी होते है।

अतः मंदिर के गर्भगृह में पुजारी के द्वारा मिलने वाली वस्तु ही भगवान् का आशीर्वाद (प्रसाद) स्वरूप है।

परन्तु गर्भगृह से बहार, मंदिर परिसर में बटने वाली वस्तु अभाव ग्रस्त, भिक्षुक के लिये तो प्रसाद है, परन्तु सम्पन्न व्यक्ति के लिये उसको ग्रहण करना पाप है।

स्पष्ट शब्दों में कहे तो मंदिर परिसर में बटने वाला दान उन व्यक्तियों के लिये तो प्रसाद है:

  1. जिनका जीवन भिक्षा से चलता हो, जो भिक्षुक हो।
  2. जो वर्तमान में किसी परिस्तिथि वश आभाव या पीड़ा में हो।
  3. जिसके पास अपना कोई साधन न हो।

अन्यों के लिये तो वह पाप ही है।

तृतीय – मन्दिर में प्रसाद रूप में वितरण होने वाली खाद्य सामग्री – एक भ्रान्ति

वर्तमान में भक्तजन अपने साथ कुछ मात्रा में खाद्य सामग्री मंदिर ले जाते है और भगवान् को भाव रूप से अर्पण करते है। अर्पण की गई खाद्य सामग्री को भक्त पुनः पुजारी से स्वयं ही ग्रहण कर लेते है और उसको अपने परिवार, सम्बन्धी, एवं मंदिर में आने-जाने वाले अन्य सम्पन्न भक्तों को प्रसाद के रूप में वितरण कर देते है।

इस प्रकार वितरण होने वाला प्रसाद (वस्तु) न तो भगवान् का आशीर्वाद ही है और न ही भगवान् के प्रति कृतज्ञता का भाव है।

प्रसाद (आशीर्वाद) तो ग्रहण करने का विषय है। प्राप्त आशीर्वाद का वितरण किस प्रकार किया जा सकता है?

बाटने वाला व्यक्ति उस वितरण को दान का नाम तो दे सकता है, परन्तु प्रसाद का नहीं। साथ ही वितरण की जाने वाली वस्तु अगर अपने सम्बन्धियों को दी जाय तो वह भेट है, वह दान भी नहीं है।

अतः देने-लेने में अगर भेट की भावना तो ठीक है। परन्तु देने वाले में अगर दान देने की भावना है, तब लेने वाला देखे की क्या उसमें दान लेने की पात्रता है?

चतुर्थ – भंडारा- एक भ्रान्ति

हिन्दू परम्परा में अन्न दान को कल्याणकारी दान माना गया है। कारण कि जो भूखा है, और उसके पास भोजन जुटाने का कोई साधन नहीं है, ऐसे को भोजन मिल जाय तो उसका जीवन निर्वाहा हो जाता है।

वर्तमान समाज में अन्न दान के नाम पर भंडारा लगाने का बड़ा चलन हो गया है। भंडारा लगाने वाला दानी भोजन के रूप में अन्न तो दान करता है, परन्तु वह यह भूल जाता है की उस दान को ग्रहण करने वाला कौन है। वह इस बात का विचार नहीं करता कि दान लेने वाला दरिद्र है या नहीं, अभाव ग्रस्त है या नहीं। क्या उसका जीवन भिक्षा पर चलता है?

श्रीमद भगवद गीता के अध्याय १७ श्लोक २० में स्पष्टता से कहा गया है कि दान उसको देना चाहिये जो अभाव में है।

इस बात का विचार न करते हुये, भंडारा ऐसे स्थान पर लगाया जाता है जहाँ लोगों का आवागमन हो। भंडारे में व्यक्ति अपने सम्बन्धी, मित्र आदि को भी भोजन के लिये आमंत्रित करता है।

क्या भंडारा प्रसाद है?

समान्य, संपन्न समाज, जिसके के पास अपने भोजन की व्यवस्था है, वह उस स्थान से गुजरता है और पंक्ति लगी देख स्वयं भी पंक्ति में लग जाता है। और भंडारे के भोजन को भगवान् का प्रसाद समझ कर ग्रहण करता है।

अब विचार करने का विषय यह है कि भंडारा भगवान् का प्रसाद किस प्रकार हो गया?

जो इस भोज में आमंत्रित व्यक्ति है, उसके लिये तो वह प्रीतिभोज है और वह पाप से बच सकता है।

परन्तु जिस व्यक्ति के पास जीवन निर्वाहा के लिये पर्याप्त व्यवस्था है, उसको तो भगवान् की कृपा पहले से ही प्राप्त है! तब वह भिक्षुक की तरह किस कारण से पंक्ति में  खड़ा हो जाता है? जो भोजन अभाव ग्रस्त लोगों के लिए है, उस भोजन को जब संपन्न व्यक्ति ग्रहण करता है, तब वह पाप का भागी बनता जाता है।

इस प्रकार के भंडारे से, लगाने वाले की मान-प्रतिष्ठा तो समाज में बढ़ सकती है, परन्तु उसको उस कृत का कोई पुण्य नहीं मिलता।

इस प्रकार के दान को श्रीमद् भगवद् गीता – अध्याय १७ श्लोक २१ एवं श्लोक २२ में राजस अथवा तामस दान कहा गया है।

उपसंहार

सनातन धर्म सिद्धांत स्पष्ट है कि मनुष्य को भगवान् का प्रसाद निरन्तर और स्वतः ही प्राप्त हो रहा है। मिलने वाली वस्तु प्रसाद तभी है जब मनुष्य में कृतज्ञता का भाव हो, अन्यथा वह भोग है।

साथ ही व्यक्ति यह स्पष्ट जाने कि प्रसाद बाटने का विषय नहीं है।