हिन्दू राष्ट्र के उत्कर्ष में स्वयंसेवक की महत्वपूर्ण भूमिका

 

हिन्दू राष्ट्र की सेवा करने वाला, हर व्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा का अनुयायी, और उसका पालन करने वाला होता है।

हिन्दू राष्ट्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करना, राष्ट्रीय स्वयंसेवक अपना दायित्व मानता है, और उसके लिये अग्रसर रहता है।

जब व्यक्ति स्वयं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक कहता है, तब वह स्वयं से प्रतिज्ञा करता है कि, वह अपने दायित्व का पूर्ण निष्ठा से निर्वाह करेगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक दायित्व का निर्वाह करने के लिये कोई विशेष प्रकार के कार्य अथवा कार्यक्रम नहीं करता है।

उसका जीवन आचरण ही हिन्दू राष्ट्र का हित करने वाला होता है। प्रतिदिन किए जाने वाले जीवन निर्वाह सम्बन्धित कार्यों से ही उसके कर्त्तव्यों की पूर्ति होती है।

सम्पूर्ण विश्व में केवल एक ही राष्ट्र है और वह हिन्दू राष्ट्र। हिन्दू राष्ट्र भौगोलिक रूप से भारत राज्य में स्थित हिन्दू समाज से बनता है।

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स्वयंसेवक का जीवन आचरण और उसके कार्य:

 

  • स्वयंसेवक अपना व्यवसाय (स्वधर्म का पालन) सुचिता से, और पूर्ण निष्ठा से करता है।
  • अपनी महत्वकांक्षाओं की पूर्ति के लिये अन्यों का अहित हो जाय ऐसा उसका भाव नहीं रहता। अतः जीवन में सन्तुष्टि, उसका मुख्य भाव होता है।
  • स्वयंसेवक का परिवार, हिन्दुत्व के संस्कार को संजोकर रखता है। इस कारण उसके कुल में प्रेम का निरन्तर प्रवाह होता है।
  • स्वयंसेवक वंचित व्यक्ति-समाज को साथ लेकर चलता है। जिस विषय को लेकर व्यक्ति-समाज वंचित होता है, उस विषय की पूर्ति के लिये स्वयंसेवक तत्पर रहता है।
  • स्वयंसेवक समाज-समुदाय में समरसता रखता है, और किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करता।
  • प्राकर्तिक आपदा के समय, आपदा ग्रसितो की यथा सम्भव सेवा तत्परता तत्परता से करता है। स्वयंसेवक को कभी भी ऐसा भाव उत्पन्न नहीं होता की वह प्राकर्तिक आपदा में अपना आर्थिक लाभ देखे।
  • वह हिन्दू राष्टवाद का प्रचार और विस्तार निरन्तर रूप से करता है।
  • भारत राज्य के भीतर और बहार से जो तत्व, हिन्दू राष्टवाद पर आघात करने का प्रयत्न करते है, उनसे समाज की सुरक्षा करना, वह अपना दायित्व मानता है।

जीवन में अनेक प्रकार के विषयों की महत्ता और उनकी प्राथमिकता

 

  • स्वयंसेवक की जीवन शैली इस प्रकार की होती है, की वह स्वयं से पहले परिवर को महत्व देता है। अर्थात स्वयं के सुख-दुःख से पूर्व वह परिवार के सुख-दुःख को महत्व देता है।
  • परिवार से पहले ‘कुल’ महत्वपूर्ण होता है। स्वयंसेवक और उसका परिवार, अपनी समृद्धि तभी पूर्ण मानता जब उसकी समृद्धि में कुल की समृद्धि भी होती हो।
  • कुल से पहले अपने सम्प्रदाय के महत्व को वह समझता है। स्वयंसेवक के कार्यों से सम्प्रदाय के अन्य प्राणीओं का अहित होता है, ऐसा कोई भी कार्य वह नहीं करता।
  • सम्प्रदाय से पहले उसके लिये प्रान्त महत्वपूर्ण होता है। स्वयंसेवक के लिये सम्प्रदाय के हित प्रान्त के हित से अधिक महत्वपूर्ण नहीं होते।
  • प्रान्त से अधिक वह भारत राज्य के प्रति अपने कर्तव्य को महत्वपूर्ण मानता है।
  • अन्ततः उसके कोई भी कार्य ऐसे नहीं होते जो प्रकृति (पर्यवरण) को हानि पहुचाये। पृथ्वी के अन्य प्राणी और जीव-जन्तु का संरक्षण करना वह अपना दायित्व समझता है।

यह ही हिंदुत्व में मनुष्य धर्म है।

 

श्रीमद् भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अध्याय ३ श्लोक २० से श्लोक २४ में श्रेष्ठ पुरषों के लिये कहा है कि वह लोकसंग्रह हेतु अपने कर्तव्य का पालन करे।

 

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।३-२१।।

श्रेष्ठ पुरुष का जैसा आचरण होता है, समाज के अन्य मनुष्य भी वैसा ही अनुसरण करते हैं। श्रेष्ठ पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देते है, दूसरे मनुष्य उसका पालन करते हैं। ||३-२१||

 

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।

लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ।।३.२०।।

राजा जनक-जैसे अनेक महापुरुष भी कर्तव्य कर्म के द्वारा ही परमसिद्धि को प्राप्त हुए हैं। क्योकि तुम पुरषों में श्रेष्ठ हो, इसलिये लोकसंग्रह के लिए अपने धर्म का पालन करो||३-२०||

 

क्योंकि स्वयंसेवक का आचरण समाज के अन्य प्राणीओं से श्रेष्ठ होता है और वह समाज के लिये उदारहण बनते है, इसलिये उसको श्रेष्ठ कहा जाय तो, अतिशयोक्ति नहीं होगी।

क्योंकि जब विषय हिन्दुत्व का हो, हिन्दू राष्ट्र की सेवा का हो, तो स्वयंसेवक समाज की पंक्ति में अग्रिम स्थान पर दीखता है।