“प्रसाद” शब्द की परिभाषा के दो भाग है। प्रथम: यह कृतज्ञता का भाव है। कृतज्ञता, जो व्यक्ति भगवान् के प्रति व्यक्त करता है जब वह संसार की किसी भी वस्तु को ग्रहण करता है। द्वितीय: कोई भी वस्तु प्रसाद तभी है, जब व्यक्ति वस्तु को उतनी मात्रा में ही ग्रहण करे, जितनी उसको जीवन […]
और पढ़ेंहे मनुष्य! तू प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर। हे मनुष्य! तू अपने सांसारिक सम्बंधों को जान। तेरा सम्बंध प्रकृति के प्रत्येक प्राणी, पदार्थ से आत्म रूप से समभाव हैं। समाजिक सम्बंध अनित्य है। अतः तू प्रकृत्ति, समाज की सेवा हेतु कार्य कर। हे मनुष्य तू स्वयं को, प्रकृति और परमात्मा को जान और जान कर […]
और पढ़ेंयह, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
और पढ़ेंपरमात्मा प्राप्ति की प्रक्रिया को योग कहते है। योग में स्थित होना मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। इस उद्देश्य के पूर्ण होने पर मनुष्य को परम् आनन्द की प्राप्ति होती है। शरीर के प्रति ममता एवं अहंकार;इन्द्रियों के विषयों में आसक्ति;आसक्ति से अन्त:करण में विषमताएं (राग, भय और क्रोध); यह सभी विकार मनुष्य को […]
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