विश्व में केवल एक ही राष्ट्र हैवह है हिन्दू राष्ट्र!

 

विश्व के जिस भौगोलिक क्षेत्र के निवासी हिन्दुत्व विचारधारा का अनुसरण करते है, वह क्षेत्र हिन्दू राष्ट्र है।

राष्ट्र उस समाज से बनता है, जो सृष्टि, प्रकृति और मनुष्यो के प्रति एक समावेशी विचारधारा रखता है। और समावेशी विचारधारा रखने वाला समाज राष्ट्रवादी कहलाता है।

संसार के वह विषय जो मनुष्य को मनुष्य से अलग करके देखे जाते है, उन विषयों से राष्ट्र की पहचान नहीं होती। अतः रंग, रूप, भाषा, पहनावा, पूजा पद्धत्ति से राष्ट्र की पहचान नहीं होती। समावेशी विचारधारा से राष्ट्र की पहचान होती है।

इन विषयों को लेकर स्वयं को अलग-अलग मानने वाले किसी भौगोलिक क्षेत्र के बहुसंख्य लोग, विशेष समुदाय के तो हो सकते है। परन्तु वह राष्ट्र नहीं है।

वह समुदाय जो किसी पहचान को लेकर अलग तो दिखते हो, परन्तु वह समावेशी विचारधारा रखते हो, तब वह समुदाय राष्ट्र की श्रेणी में आता है।

जो समाज-समुदाय अपने को विशिष्ट के रूप में देखता है और अन्य समाज-समुदाय पर अपना आधिपत्य रखता हो, या प्रयत्न करता हो, वह राष्ट्र नहीं कहलाया जा सकता।

शासन-प्रशसन और परिसीमा के आधार पर भौगोलिक क्षेत्र राज्य कहलाता है। इस प्रकार का प्रत्येक राज्य राष्ट्र नहीं है। वह राज्य जिसके नागरिक और शासन-प्रशसन समावेशी विचारधारा रखते हो, वह राज्य राष्ट्र कहलाता है।

एक और एक से अधिक राज्य, राष्ट्र में समाहित हो सकते है। राष्ट्र, राज्य की परिसीमा से बाधित नहीं होता।

 

समावेशी विचारधारा क्या है?

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एक वाक्य में कहा जाय तो, वह विचारधारा जो सनातन धर्म सिद्धान्त का अनुपालन करती हो, वह समावेशी विचारधारा है।

जो समाज विश्व के सभी प्राणी को एक परिवार के रूप में देखाता हो और उसी भाव से कार्य करता हो, उस समाज की विचारधारा समावेशी है। परिवार के रूप में देखने का अर्थ है, प्रकृति में जो भी संसाधन, सम्पदा उपलब्ध है, उसको मिल कर प्रयोग करना।

इस समावेशी विचारधारा के अन्य मुख्य बिन्दु इस प्रकार है:

  1. इस विचारधारा के लोग सृष्टि, समाज एवं स्वयं, सभी की समृद्धि के लिये समान रूप से कार्य करते है। उनका ऐसा भाव नहीं होता कि सृष्टि की सम्पदा केवल उनके स्वयं के लिये है।
  2. प्रकृति से जो भी सम्पदा प्राप्त है, उसका उपयोग वह आवश्यकता के अनुरूप करते है। उसका व्यर्थ भोग नहीं करते और उसका संग्रह नहीं करते।
  3. भूमण्डल की सम्पदा का संरक्षण करना, वह अपना दायित्व मानते है।
  4. अपने पुरषार्थ से जो भी सामग्री, प्रकृति से प्राप्त होती है उनको अन्यों के हित में लगा देने में तत्पर रहते है।
  5. सभी प्राणियों में विविधता है, इसको वह खुले मन से स्वीकार करते है। विविधता होने पर भी सभी प्राणीओं का मूल तत्व एक ही है, इसमें वह पूर्ण रूप से विश्वास रखते है। देश, वस्त्र, रंग, पूजा पद्धति, भाषा से अलग-अलग हो सकते है, परन्तु सब में परमात्मतत्व एक ही है।
  6. जो समाज किसी अन्य समाज पर अपना आधिपत्य न थोपता हो, वह समाज समावेशी है। मेरी विचारधारा ही सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा भाव न होना ही समावेशी विचारधारा है।

 

हिन्दू राष्ट्र की समावेशी विचारधारा

हिन्द महासागर के उत्तर में स्थित भारत उपमहाद्वीप के मूल निवासि हिन्दू नाम से जाने जाते है।

भारत उपमहाद्वीप में आने वाले अब्राहमिक पूजा पद्धत्ति, विचारधारा वाले लोग, मूल निवासि नहीं है। इस समुदाय की विचारधारा समावेशी न होकर, विशिष्टता का भाव रखती है। इस कारण से यह समुदाय मूल निवासिओं से अलग स्पष्ट रूप से दिखता है।

क्योकि इस उपमहाद्वीप के निवासी समावेशी विचारधारा रखते हैं, इसलिये इस समावेशी विचारधारा को हिन्दुत्व विचारधारा भी कहते है।

हिन्दुत्व विचारधारा में वह सभी गुण है जो राष्ट्र को परिभाषित करते है। अतः भारत राज्य को हिन्दू राष्ट्र भी कहा जाता है।

भारत ही एकमात्र राज्य है, जिसमें अनेक प्रकार के समुदाय होने पर भी सभी एक परिवार की तरह रहते है।

हिन्दू राष्ट्र में अनेक लघु-लघु विचार है, जो हिन्दू समाज की समावेशी विचारधारा व्यक्त करती है।

“एकं सत्यं बहुधा वदन्ति”

सत्य एक ही है, उसे अनेक प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है।

संस्कृत के केवल चार शब्द बहुत ही सुन्दर रूप से विचारों और पूजा पद्धत्ति की भिनता को स्वकारीय बनाते है।

अर्थात सृष्टि का आधार तो केवल एक ही है, एक ही हो सकता है और एक ही रहने वाला है। परन्तु हिन्दू राष्ट्र यह स्वीकार करता है कि इसको अनेक प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है। मनुष्य जिस प्रकार अपना कल्याण समझे सो करे।

“वसुधैव कुटुम्बकम”

इस पृथ्वी के सभी प्राणी से बनता है हमारा विशाल परिवार और मैं इस विशाल परिवार का एक तुछ सा अंग हूँ।

संस्कृत के ये दो शब्द अति सुन्दरता से पृथ्वी के समस्त प्राणीओं को एकता के एक सूत्र में बाँध देते है। इस परिवार में केवल मानव समाज नहीं आता अपितु पृथ्वी के जड़ और चेतन सभी प्राणी आ जाते है।

इससे अधिक समावेशी कोई भाव हो नहीं सकता। जब सभी को अपना परिवार मान लिया तो भिनता कहा रह गई?

यह केवल एक भाव ही नहीं अपितु हिन्दू इस भाव से जीता है। यह ही कारण है की हिन्दू विश्व के जिस कोने में भी जाता है, वहां प्रेम और समरसता से रहता है।  किसी प्रकार का उपद्रव नहीं करता।

भारत ही विश्व का एकमात्र राज्य है जो राष्ट्र की परिभाषा को यथार्त करता है।

राष्ट्र का अनुवाद Nation या Nation-State नहीं है

पृथ्वी का वह भौगोलिक क्षेत्र जिसके निवासी अपनी एक राजनितिक एवं समाजिक पहचान रखते है, वह भौगोलिक क्षेत्र Nation कहलाता है। क्योकि Nation की एक परिसीमा होती है, इसलिये उसको Nation-State भी कहा जाता है। Nation का अपना शासन, प्रशासन होता है।

Nation एक विघटनकारी विचारधारा है, जो रंग, भाषा, समुदाय, इतिहास, पूजा पद्धत्ति, आदि से अपनी पहचान बनाती है। प्राय अपनी अलग पहचान रखने वाले राज्य अन्य राज्यों से संघर्ष करते है और अपनी विचारधारा को श्रेष्ठ और अन्यों स्थापित करने का प्रयत्न करते है।

राज्य की सीमा की सुरक्षा का भाव राजभक्ति (देश भक्ति) है, NATIONALISM नहीं। राष्ट्र भक्ति में राज्य की सुरक्षा और हिन्दुत्व का सरक्षण दोनों आ जाते है।

विश्व में Nation की परिभाषा को लेकर कोई एक मत नहीं है।

अतः Nation या Nation-State का भाव, राष्ट्र के भाव से पूणतया भिन है।